भारत की पहली महिलाओं के लिए महिला शिक्षिका (1848) जब भारत में ईरान अफगानिस्तान तिब्बत नेपाल श्रीलंका म्यांमार जावा सुमात्रा इंडोनेशिया ब्रह्मदेश बांग्लादेश मलेशिया और आज का भारत शामिल होते थे तब शूद्रों को शिक्षा संपति अधिकार नहीं होते थे शूद्रों को सिर्फ ब्राह्मण बनिया ठाकुर इन 15% लोगों की सेवा करना ही एकमेव कल्याण करने का मार्ग था तभी महात्मा फूले जी ने मनुस्मृति कानून के खिलाप बगावत किया और शूद्रों को अंग्रेजो के मदत से शिक्षा प्रारंभ किया तभी पुना के ब्राह्मणों ने फूले का वध करने का प्रयास किया और सावित्रीमई को शेन चिखल पत्थर से पिटने का कार्यक्रम चालू किया लेकिन उसी वक्त सत्यशोधक क्रांतिकारी लाहुजी सालवे और उनकी पूना गुलटेकडी में स्थित तालीम जिसमे युद्धकला, गनिमी युद्ध कौशल्या, युद्धसस्त्र चलाना आदि प्रशिक्षण देते थे, उन्होंने महात्मा फूले, सावित्रीमई फूले इनको स्वरक्षण की जिम्मेदारी क्रांतिगुरु लाहुजी सालवे जी ने अपने कंधों पर लिया तभी महात्मा फूले और सावित्रीमई फूले को बहुजन समाज और तमाम महिलाओं को शिक्षा का अधिकार सम्पन्न हुआ.
लहुजी ना होते तो महात्मा फूले अपना मिशन पूरा नहीं कर सकते थे और मनुवादी ब्राह्मण उनका वध करते थे. महिला और शूद्रों को शिक्षा देने का प्रण जो महात्मा फूले और सावित्रीमई फूले ने मनुस्मृति के विरोध में लिया था कभी पूरा ना होता. बहुजनो के शिक्षा के लिए दोनों दाम्पत्य ने अपना जीवन दांव पर लगा दिया था लेकिन आज बहुजन समाज वही मनुस्मृति और हिन्दू धर्म की वकालत करता हैं जिसके कारण बहुजन समाज 3000साल से अधिक समय से गुलाम बनाया गया था. आज भी छह आंकड़ों में पगार लेनेवाले बहुजन समाज के स्री पुरुष को महात्मा फूले सावित्रीमाई फूले के बारे में बहुत कम ज्ञान है कारण उनके दिमाग में ब्राह्मणों की मानसिक गुलामी की नशा वैसे ही हैं जैसी पहले थीं. आज का कृतघ्न बहुजन समाज भले ही फूले दंपत्ति को याद ना करता हो लेकिन आनेवाली gen z जरूर याद करते हुए उनके विचार में लिन होकर उसका पालन भी करेगी. सावित्री माई फूले की जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं.
डॉ प्रीतीश जलगांवकर