जीवन में एक युद्ध चल रहा है,
स्वयं का स्वयं के विरुद्ध चल रहा है !
जीत भी मेरी है, मैं ही हार रहा हूँ,
जय और पराजय, दोनों स्वीकार रहा हूँ!
खुश भी मैं हूँ, निराश भी मैं हूँ,
असमंजस भरे क्षण में, विश्वास भी मैं हूँ!
आसक्ति भी है, विरक्ति भी है,
हर ओर विस्मय का आभास भी मैं हूँ!
हर संग्राम वीभत्स नहीं होता है,
हर बार कोई अस्तित्व नहीं खोता है!
शिखर पर और सिंहासन पर
हर इंसान अकेला होता है!!
आज आकाश द्रवित है,
आनंद से पल्लवित है !
महाकाल का तांडव है,
संसार भी पुलकित है!
परिवर्तन देख रहा हूँ,
आगे ना जाने क्या होगा!
कुछ तो मंगल दिखता है,
शायद ! आक्रोश बड़ा होगा!
कुछ छुपा भी नहीं सकता हूँ,
कुछ बता भी नहीं सकता हूँ!
ये कैसा असमंजस है,
दिखा भी नहीं सकता हूँ!!
हृदय में एक मंजर है,
ना बयां कर सकता हूं !
प्रत्यक्ष देख कर भी,
सब कुछ भुला सकता हूँ !!
जीधर ढूंढ रहा था जिंदगी,
उस मोड़ ने झकझोर दिया !
गहरे नींद से जगाकर,
सपने को चकनाचूर किया!!
निष्कलंक और निश्छल है,
ये रास्ता पुराना है !
मुसाफिर एकल है,
मंजिल भी अंजाना है !!
आपने अस्तित्व को नीचे गिराउंगा नहीं,
अपना हृदय चीर के दिखाऊंगा नहीं !
भले भूखा हूँ पर, फेंके हुए टुकड़े..
कभी खाऊँगा नहीं !!
जीवन के इस पुराने स्वरुप को,
खुद ही संवार रहा हूँ!
जीत भी मेरी है, मैं ही हार रहा हूँ,
जय और पराजय, दोनों स्वीकार रहा हूँ!
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*कविता रचनाकार:*-
विजय सिंह, बलिया (उत्तर प्रदेश)
*प्रस्तूतकर्ता:*
चंद्रकांत सी. पुजारी
(गुजरात प्रदेश प्रभारी)
स्वाभिमानी संपादक सेवा संघ
महुवा,सुरत (गुजरात प्रदेश)
*संकलन*
समता न्यूज नेटवर्क
श्रीरामपूर (महाराष्ट्र)
*M - 956117411*

