कितने पन्नै बाकी है लिखने को मुझे पता नही
मै मेरी जिंदगी के पन्नो पर लिखना चाहता हुॅं
बहोत देर लगा दि हमने अपना चेहरा पढने को
गहराई नापने को भावनावों के भवर से बाहर निकलने को!
मैने कुच्छ नही कमाया ऐसा नही गवाया भी नही
जिंदगी तु देर से समज आयी फिर भी बहोत से पन्ने लिखना बाकी है
मै खुश हुॅं की मुझे जिने के लिए सोचना नही पडता
जो जी रहा हुॅं वही लिख रहा हुॅं
आरंभ है तो अंत भी है
मै शैतान हुॅं तो संत भी हुॅं!
एक एक पन्ना मेरा बड रहा है अंतिम छोर की ओर
लेके तो जाउंगा नही जहाॅंसे कुच्छ छोड जरुर जाउंगा
ए जो लिख्खे हुवे पन्ने है उन्हे एक साथ जोड दुंगा फिर मेरी अंतिम साॅंस छोड दुंगा!
उसे किताब मत समझना
जिंदगी ही मेरी कविता है
कविता ही मेरी जिंदगी है
कुच्छ पन्ने मैने कोरे रखै है
कुच्छ पन्ने मैने लिखकर फाड दिये है
जिंदगी के......
अभी तक मुझे वो कविता सुझी नही!
और सुझना भी नही चाहीऐ!
मुझे!
सुझी तो वो कविता मेरे रक्त से रंजित होगी....
कुछ घाव , कुछ भाव, एहसास महेसुस किये तो जाते है...
पर!
वे पन्ने पे कभी लिखी नही जाती!
वो हमेशा छपी तो रहेती है दिल मै!
वो प्रकाशित नही होती!
आकाश सुपारे
9822510254

